फगुआ के मस्ती सब झूमत औ गावत बा
लेके गुलाल रंग अंग अंग सब लगावत बा
"सागर सनेही"बचवा अइलें ना घर हमरो
बहे अंखियां से लोर याद माई के सतावत बा
फगुआ में कहां अंझुरइलें हो
बचवा काहें नाहीं अइलें
ममता के कइसे भुलि गइलें हो
बचवा काहें नाहीं अइलें
सोचलीं कि अइहं त उबटन लगाइब
दुःखवा दरिद्र उनके दूर हम भगाइब
ललसा अधूरा रह गइलें हो
बचवा काहें नाहीं अइलें
पुआ, पकवान खूब निक हम बनइतीं
बबुआ के हाथे अपनी हमहूं खियइतीं
सपना पर पानी फिर गइलें हो
बचवा काहें नाहीं अइलें
सागर सनेही कुछ कहलो ना जात बा
भीतर भीतर मन मोरा अकुलात बा
केवनी माया में परि गइलें हो
बचवा काहें नाहीं अइलें







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