चढ़ते फागुन के हों महीना
देवरा पीछे पड़ल कमीना
बैरी भइल बा हो फगुनवा न
अब घर आजा सजनवा न
भइल बा दिवाना मुअना हमरी चाल पर
कइले बा आंख हमरी गोरे गोरे गाल पर
ओकर कइसे करीं भरोसा
अचके में कर दीही धोखा
बढ़ल बाटे ओकर मनवा न
अब घर आजा सजनवा न
अगहीं से देता ऊ त हमरा के धमकी
तोही से खेलब रंग भउजी हो अबकी
करबू केतनो तूं हूं चतुराई
अबकी बृथा दांव न जाई
रंगब तोहरो सारा बदनवा न
अब घर आजा सजनवा न
करतानी फोन हम अइह जरुर जी
ना त 'सागर"देवरा करी मजबूर जी
गन्दी एकर नीयत बाटे
अब त दारू पीयत बाटे
कर दीही कवनो घटनवा न
कि अब घर आजा सजनवा न







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