Saturday, March 7, 2026
फगुआ में कहां अंझुरइलें हो बचवा काहें नाहीं अइलें
अचके में नेहिया सनेहिया भुलाईबचवन के छोड़ि कहां गइलू ए माई
कइसे् लें आईं तोहरा के हार धनिया अब्बो नथुनी के बाकी उधार धनिया
दुनिया के रीति नीति गजबे निराली बिना रे सजनवा गवन गोरी जाली
Tuesday, March 3, 2026
रहिया निहारे पिपरवा के छाव रेआजा परदेसिया बोलावे तोर गांव रे
रहिया निहारे पिपरवा के छाव रे
आजा परदेसिया बोलावे तोर गांव रे
याद करा तुहु पहिले के बतिया
होलिया के दिनवा आ होलिया के रतिया
फिर से उहे पिरितिया जगाव रे
आजा परदेसिया बोलावे तोर गांव रे
तोहरा बिना ई फगुनवा न सोहे
लाल गुलाबी अंगनवा न सोहे
केतनो पियाई चढ़त नइखे भाग रे
आजा परदेसिया बोलावे तोर गांव रे
सुनिके पपीहरा और मोरवा के बोलिया
लागे करेजवा में जैसे कि गोलियां
नीक न लागे कागा के काव रे
आजा परदेसिया बोलावे तोर गांव रे
अमवा इमिलिया के सुंदर बगिया
ग उ वा के लोगवा के मीठी मीठी बोलिया
कहे जितेंद्र वचनिया निभाव रे
आजा परदेसिया बोलावे तोर गांव रे
रहिया निहारे पिपरवा के छाव रे
आजा परदेसिया बोलावे तोर गांव रे
रचना गायन-:
जितेंद्र पांडेय जी
अयोध्या उत्तर प्रदेश
Wednesday, February 25, 2026
मोहन संग खेलत राधा प्यारी बरसाने में होली
धूम मचल बा ,आज बिरज में
खेलत होरी मुरारी हो
राधा प्यारी संग में शोभत
रूप अति मनिहारी हो
मोहन संग खेलत राधा प्यारी 3
बरसाने में होली 2
केहू के भिगत पाग पगरिया 2
केहू के भिगत चोली
मोहन संग ......
केहु चटकट केहु मॅट कट आवे
केहु जोगीरा फ़ाग सुनावे
बा धूम मचल मधुबन गलियन में
जुटल गोपियन के टोली
मोहन संग ......
होली आई रे कन्हाई रंग बरसे सुना दे जरा बासुरी
राधा गोरी श्याम के रंग में हो गइल मतवाली
रंग गुलाल से चमकत चुनरी चमकत आओठ के लाली
देखी अति आनंद मगन मन भइले करत श्याम ठिठौली
बरसाने में होली 2
मोहन संग ......
Tuesday, February 24, 2026
एक प्यारा-सा गाँव, जिसमें पीपल की छाँव- सुदर्शन फ़कीर
एक प्यारा-सा गाँव, जिसमें पीपल की छाँव
छाँव में आशियाँ था, एक छोटा मकां था
छोड़ कर गाँव को, उस घनी छाँव को
शहर के हो गये हैं, भीड़ में खो गये हैं
वो नदी का किनारा, जिसपे बचपन गुज़ारा
वो लड़कपन दीवाना, रोज़ पनघट पे जाना
फिर जब आयी जवानी, बन गये हम कहानी
छोड़ कर गाँव को.....,
किनते गहरे थे रिश्ते, लोग थे या फ़रिश्ते
एक टुकड़ा ज़मी थी, अपनी जन्नत वहीं थी
हाय ये बदनसीबी, नाम जिसका गरीबी
छोड़ कर गाँव को.....,
ये तो परदेश ठहरा, देश फिर देश ठहरा
हादसों की ये बस्ती, कोई मेला न मस्ती
क्या यहाँ ज़िंदगी है, हर कोई अजनबी है
छोड़ कर गाँव को..….......













